अंधविश्वास में जकड़ा महिला समाज

अंधविश्वास में जकड़ा महिला समाज

आज भी बहुत सारे घर ऐसे हैं जहां महिलाएं अंधविश्वास के साये में जी रही हैं और सिर्फ जी ही नहीं रही बल्कि उसे प्रोत्साहन भी दे रही हैं, बिना सोचे विचारे प्रोत्साहन, जिसे देखकर सोचना पड़ता है कि क्या वाकई हम 21वीं सदीं में जी रहे हैं। क्या हमारी मानसिकता 21वीं सदी के अनुरूप हो पाई है।
हम कहते हैं कि कुछ भी असंभव नहीं यहां बशर्ते आपके पास लगन हो और आत्मविश्वास हो। फिर कांच के टूट जाने या बिल्ली के रास्ता काट देने से हम यह क्यों कहने लगते हैं कि आज कुछ मत करो, कहीं मत जाओ। अपशगुन के भय से यदि कर्म करना छोड़ दो तो फिर असंभव संभव कैसे होगा। लगन और आत्मविश्वास का औचित्य ही क्या रह जाएगा।
कहा जाता है कि ‘मांग में सिंदूर भरते समय यदि सिंदूर नाक पर गिर पड़े तो उसका पति उसे ज्यादा प्यार करता है।
सिंदूर, सूखा पाउडर है, जब इसे चुटकी भर लेकर माथे पर लगाया जाएगा तो छिटक कर नाक पर ही गिरेगा, ठोड़ी अथवा दाढ़ी पर तो नहीं, तो इसमें प्यार अथवा नफरत का क्या संबंध है।
ऐसे ही मेंहदी और पान के संबंध में भी कहा जाता है कि मेंहदी उसी के हाथ में ज्यादा रचती है जिसका पति उसे ज्यादा चाहता है। यदि ऐसा होता तो घर घर जाकर मेंहदी रचाने वालियों के पति उन्हें और औरतों से ज्यादा प्यार करते होंगे क्योंकि उनके हाथ तो हमेशा मेंहदी से लाल ही रंगे होते हैं जबकि हकीकत तो यह होती है कि ऐसे औरतें अनपढ़ और गरीब होने के कारण अपने पति के हाथों सबसे ज्यादा पीटी जाती हैं।
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अंधविश्वास औरत की कमजोरी है और भावुकता उसकी विशेषता। इन्हीं दोनों चीजों के सहारे औरतों के दैनिक जीवन में भी पाबंदी लगाई जाती है और औरतें साक्षरता के अभाव में उन्हें स्वीकार भी कर लेती हैं कि हां, आज बुधवार है या बृहस्पतिवार है इसलिए बाल मत धोवो, भाई का अनिष्ट होगा। मंगलवार है इसलिए नाखून मत काटो, पुत्र को कष्ट होगा। जरा विचार कीजिए, बुधवार या बृहस्पतिवार और बहन के बाल से भाई का क्या संबंध है? मंगलवार और नाखून से पुत्र को क्या लेना देना। ऐसी पाबंदियां केवल महिलाओं के लिए ही क्यों हैं? पुरूषों के लिए क्यों नहीं।
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क्या भाई पुरूषों के नहीं होते या फिर पुत्र सिर्फ माता का होता है, पिता का नहीं।
जरा विचार कीजिए इन अंधविश्वासों को पालना अथवा प्रश्रय देना कहां तक उचित है। क्या आपको नहीं लगता कि प्रगति की इस दौड़ में हम अपने आप को चाहे कितना ही प्रगतिशील क्यों न मान लें, ये अंधविश्वास, हमें हमारे पिछड़ेपन का कटु एहसास करा ही देते हैं। अब वक्त आ गया है कि इन अंधविश्वासों को अपनी तर्क की कसौटी पर कसें कि ये कहां तक उचित है और कहां तक अनुचित। उसके बाद ही उन पर विश्वास करें।
– विश्वनाथ चौधरी

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