अंतिम पड़ाव पर लोढ़ा कमेटी और बीसीसीआई की रार

अंतिम पड़ाव पर लोढ़ा कमेटी और बीसीसीआई की रार

bcci-scबीसीसीआई और लोढ़ा कमेटी की लड़ाई अब अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी है। क्रिकेट को सियासतदानों से मुक्त कराने के लिए कमेटी ने सभी घोड़े दौड़ा दिए हैं। फिलहाल गेंद इस समय सुप्रीम कोर्ट के पाले में है। फैसले की अगली तारीख मुकर्रर की गई है। लेकिन अभी तक दिए गए तकरीबन सभी सभी फैसले लोढ़ा कमेटी के पक्ष में ही रहे हैं। पूरे जगत के लिए खेल अब विश्व शांति व भाईचारे का प्रतीक बन गए हैं। खेल के माध्यम से मुल्क को, खिलाडियों, प्रशिक्षकों व खेल प्रशासकों को विश्व बिरादरी से बहुत मान व नाम मिलता है। यही कारण है कि आज हर कोई खेल प्रशासन में जगह बनाने के लिए खेल संघों में घुसपैठ कर रहा है। इस दौड़ में राजनीतिज्ञ लोग सबसे आगे हैं। कुछ खेल कैरियर वाले लोग भी खेल संघों तथा राजनीति तक पहुंचे हैं। खेल संघों में राजनीति न हो इसके लिए अलख जगने लगी है। शुरूआत क्रिकेट से हो रही है। लोढ़ा कमेटी ने इक्कीस नवंबर को बीसीसीआई के कुछ अधिकारियों को हटाने के लिए एक और रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश करके बीसीसीआई के ताबूत में आखिरी कील घोप दिया है। इससे बीसीसीआई के भीरत खलबली मचा दी है। कोर्ट को लोढ़ा समिति ने नई दलील पेश की है। नई दलील में कहा है कि बीसीसीआई में सत्तर साल से ज्यादा उम्र के लोगों को तुरंत हटाया जाए। उनकी इस मांग से बीसीसीआई के भीतर हलचल मचा दी है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट भी इस दलील के पक्ष में है। खैर इसके लिए अगली तारीख निर्धारित की है। देश व राज्य के सभी खेल संघों में इस समय तकरीबन राजनीतिज्ञ तथा नौकरशाहों का कब्जा है। वह ही सभी खेल संघों के सर्वेसर्वा हैं, जिससे खेलों का बहुत बुरा हाल है। सभी खेलों में राजनीति इस समय चर्म सीमा पर है।
http://www.royalbulletin.com/अब-राजधानी-में-दस-के-सिक्क/क्रिकेट में पिछले कुछ सालों से सियासत का जमकर खेल खेला जा रहा है। सियासत क्रिकेट से उपर आ गई है। क्रिकेट से सियासत खत्म करने के लिए लोढ़ा समीति का कठन किया गया है ताकि सफाई हो सके। अब लोढ़ा समिति ने बीसीसीआई के प्रशासन की निगरानी के लिए पूर्व केन्द्रीय गृह सचिव जीके पिल्लै को पर्यवेक्षक नियुक्त करने हेतु सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मांगी है। समिति ने उसके द्वारा निर्धारित पैमाने को पूरा करने में विफल रहने वाले बीसीसीआई के सभी और राज्य इकाइयों के पदाधिकारियों को तत्काल पद पर बने रहने से रोकने के लिये कोर्ट से अनुमति मांगी। समिति ने सचिवालय कर्मचारियों और सहायकों की नियुक्त करने तथा उनका वेतन निर्धारित करने का अधिकार देने का भी न्यायालय से अनुरोध किया। लोढ़ा कमेटी की अगर मौजूदा मांगों का जायज ठहरा गया तो क्रिकेट एकदम साफ-सुधरा हो जाएगा। लोढ़ा कमेटी और बीसीसीआई के बीच यह तनातनी पिछले दो सालों से चल रही है। लेकिन एक बार फिर से दोनों आमने-सामने हैं। हालांकि साल भर पहले बीसीसीआई ने कमेटी की नौ सिफारिशों को मान भी लिया था जिसमें अपेक्स काउंसिल बनाना, अपेक्स काउसिंल में सीएजी का सदस्य होना, आईपीएल गवर्निंग काउंसिल में सीएजी का प्रतिनिधित्व और खिलाड़ियों का संगठन बनाना शामिल था। लेकिन इससे लोढ़ा कमेटी संतुष्ट नहीं है।
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इन्हीं सब बातों को लेकर पिछले दो सालों से बीसीसीआई और लोढ़ा पैनल में खींचतान मची हुई है। बोर्ड लोढ़ा पैनल की सिफारिशें पूरी तरीके से लागू करने को तैयार नहीं है और ढीला रवैया अपना रहा है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही आदेश दे चुका है कि सिफारिशों को पूरी तरह लागू करे, लेकिन बावजूद इसके बीसीसीआई अपनी अलग दलील रखता रहा है। .बीसीसीआई को लोढ़ा कमिटी की 70 साल से ज्यादा उम्र के पदाधिकारियों की छुट्टी, एक व्यक्ति के पास एक से ज्यादा पद ना हो, एक राज्य का एक से ज्यादा वोट ना हो, चयन समिति में तीन सदस्य हों, पदाधिकारियों के नौ साल या तीन कार्यकाल और पदाधिकारियों का कार्यकाल लगातार ना हो जैसी सिफारिशों पर एतराज करता रहा है। दोनों के बीच रार अभी लंबी चलेगी। दोनों तरफ से तल्ख टिप्पिणयां की जा रही है। इसी साल पिछले माह अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के वित्तीय अधिकार सीमित करते हुए लोढ़ा समिति से एक स्वतंत्र ऑडिटर नियुक्त करने को कहा था। बीसीसीआई के वित्तीय अधिकार सीमित करने का आदेश देते हुए बोलियों और ठेकों के लिए वित्तीय सीमा का निर्धारण किया था। न्यायालय ने लोढ़ा समिति से कहा है कि वह एक स्वतंत्र ऑडिटर नियुक्त करें जो बीसीसीआई के सभी वित्तीय लेन-देन की समीक्षा करेगा। लोढ़ा कमेटी और बीसीसीआई लड़ाई कहां रूकेगी यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन इससे क्रिकेट की लोकप्रियता जरूर कम हो रही है।
http://www.royalbulletin.com/former-madhya-pradesh-governor-ram-naresh-yadav/ देखा जाए तो क्रिकेट जनता की खेल धरोहर है। बूढ़े-बच्चे सभी इस खेल के दिवाने हैं। दोनों की यह तकरार उनके खेलप्रेम को कम कर रही है। बीसीसीआई के भीतर क्या हो रहा है इसका जनता को जानने का हक है? क्रिकेट किसी ताकतवर लोगों की जागीर नहीं है। लोढ़ा समिति की सिफारिशों की लगभग सभी पूर्व खिलाड़ियों ने सराहना की है लेकिन एक मुद्दा है जिस पर मतभेद बना हुआ है। टीम के चयन में पारदर्शिता लाने और इसे भाई-भतीजेवाद से दूर रखने के लिए समिति ने राष्ट्रीय चयन समिति को पांच की जगह केवल तीन सदस्यों तक ही सीमित रखने को कहा है। लोढ़ा कमेटी का कहना है चयन पैनल में कम लोगों के होने से चयन में गड़बड़ी नहीं होगी। इसमें पारदर्शिता ज्यादा रहेगी। इसका भी पूर्व क्रिकेटरों ने स्वागत किया है। लेकिन बीसीसीआई ऐसा नहीं चाहती। वह चयन प्रक्रिया को अपने हाथ में ही रखना चाहती है। अपने हिसाब से टीम का चयन करना चाहती है। किसे रखना है किसे नहीं उनका अधिकार हो।
– रमेश ठाकुरआप ये ख़बरें अपने मोबाइल पर पढना चाहते है तो दैनिक रॉयलunnamed
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